उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hans kar milte ho bhai

हँस कर मिलते हो भाई

ہنس کر ملتے ہو بھائی

शायर: Yasir Raza Asif8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हँस कर मिलते हो भाई
बुग़्ज़ भी रखते हो भाई

मैं तो बर्फ़ का टुकड़ा हूँ
मुझ से जलते हो भाई

और मैं अब कितना चीख़ूँ
ऊँचा सुनते हो भाई

तुम भी पाक-पतन से हो
चंचल लगते हो भाई

अन्दर से भी वैसे हो
जैसे दिखते हो भाई

आग उगलते मंज़र को
क्या लिख सकते हो भाई

मज़दूरी भी करते हो
इश्क़ भी करते हो भाई

'आसिफ़' ऊँचे शमलों से
तुम क्यों डरते हो भाई