उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hamari zist ka ek ek bab khul jae

हमारी ज़ीस्त का इक एक बाब खुल जाए

ہماری زیست کا اک ایک باب کھل جائے

शायर: Obaidur Rahman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हमारी ज़ीस्त का इक एक बाब खुल जाए
ख़ुदाया हम पे हमारी किताब खुल जाए

फिर इस के बा'द ये दश्त-ओ-दमन भला क्या हैं
जो ग़ौरो-ओ-फ़िक्र करें आफ़्ताब खुल जाए

ज़मीं पे रास्ता आए नज़र तो क्या है अजब
ये रास्ता तो मियाँ ज़ेर-ए-आब खुल जाए

ख़तीब चीख़ता है रोज़ ही सर-ए-मिंबर
मजाल क्या है जो हम पर ख़िताब खुल जाए

न जाने कब से दर-ए-ख़्वाब पर है क़ुफ़्ल पड़ा
ख़ुदाया अब तो कोई हम पे बाब खुल जाए

हमारे फ़र्ज़ का दफ़्तर तो खोल डाला है
वरक़ हुक़ूक़ का भी इक जनाब खुल जाए

'उबैद' देना है हम सब को इम्तिहाँ इक दिन
दुआएँ कीजे कि हम पर निसाब खुल जाए