उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum shahr-e-mohabbat ko basane mein lage hain

हम शहर-ए-मोहब्बत को बसाने में लगे हैं

ہم شہر محبت کو بسانے میں لگے ہیں

शायर: Nafas Ambalvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम शहर-ए-मोहब्बत को बसाने में लगे हैं
कुछ लोग मगर आग लगाने में लगे हैं

तारीख़ तो तारीख़ है हरगिज़ न मिटेगी
नादाँ हैं जो तारीख़ मिटाने में लगे हैं

अफ़सोस कि इस जंग में अब ज़िल्ल-ए-इलाही
ख़ुद अपने ही लश्कर को हराने में लगे हैं

वो है कि कहानी ही बदलने पे तुला है
और हम हैं कि किरदार निभाने में लगे हैं

कुछ दर्द तो ज़ुल्मत ने दिए हैं हमें लेकिन
कुछ ज़ख़्म चराग़ों को जलाने में लगे हैं

लौटे हैं तो अब साथ फ़क़त गर्द-ए-सफ़र है
अब जा के कहीं होश ठिकाने में लगे हैं

जो बात 'नफ़स' सारे ज़माने पे 'अयाँ थी
हम हैं कि वही बात बताने में लगे हैं