उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum rahen ya na rahen par kuchh gila rah jaega

हम रहें या न रहें पर कुछ गिला रह जाएगा

ہم رہیں یا نہ رہیں پر کچھ گلہ رہ جائے گا

शायर: Vijay pratap singh5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम रहें या न रहें पर कुछ गिला रह जाएगा
एक आशिक़ देखता सा मुब्तला रह जाएगा

मैं खड़ा रह जाऊँगा बस आस्ताँ पर सोचता
फूल भी गुल-दान में ही बस खिला रह जाएगा

दर-ब-दर हो कर यहाँ से जब चला जाऊँगा मैं
तब मुझे फिर खोजता सा ये जहाँ रह जाएगा

बस नदी के पास तक ही लोग ले कर आएँगे
इस नदी के घाट पर ही क़ाफ़िला रह जाएगा

ज़िक्र भी होगा नहीं तेरे फ़साने में तिरा
इस फ़साने से निकल कर तू निहाँ रह जाएगा