उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hath kyunkar mila nahin paya

हाथ क्यूँकर मिला नहीं पाया

ہاتھ کیونکر ملا نہیں پایا

शायर: Vijay pratap singh10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाथ क्यूँकर मिला नहीं पाया
जबकि सोचा था जा नहीं पाया

देर तक मैं खड़ा रहा दर पर
तुम ने सोचा कि आ नहीं पाया

रहगुज़र में तो साथ है जैसे
तुझ को आख़िर कहाँ नहीं पाया

मैं ने तुम को तो पा लिया लेकिन
मैं ने अब तक ख़ुदा नहीं पाया

बहुत पाया भी तो ज़माने में
कुछ भी तेरे सिवा नहीं पाया

मैं ने सोचा कि सब बताऊँगा
पर मिला तो बता नहीं पाया

ख़ूब चाहा कि आज़माऊँ भी
पर कभी आज़मा नहीं पाया

तीरगी साथ ही रही हर दम
शम्अ' कोई जला नहीं पाया

एक ही भूल थी मगर अब तक
किस ने किस ने सज़ा नहीं पाया

हो गया हूँ जुदा भले तुम से
तुम को ख़ुद से जुदा नहीं पाया