उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum jo oDhe hue ehsas ki chadar nikle

हम जो ओढ़े हुए एहसास की चादर निकले

ہم جو اوڑھے ہوئے احساس کی چادر نکلے

शायर: Iffat Zarrin6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम जो ओढ़े हुए एहसास की चादर निकले
जिन को इंसान समझते थे वो पत्थर निकले

ख़ुश्क मौसम था मगर डूब गए अहल-ए-ज़मीं
हम ने पत्थर जो हटाए तो समुंदर निकले

बै'अत-ए-दस्त-ए-यज़ीदी मुझे मंज़ूर नहीं
मिरी इस बात पे हर सम्त से ख़ंजर निकले

बस्तियाँ भी तो दरिंदों से नहीं हैं महफ़ूज़
घर से निकले भी कोई शख़्स तो क्यूँकर निकले

जब्र-ए-तहज़ीब की तारीख़ यही है अब तक
एक दीवार गिराई तो कई घर निकले

उन के चेहरे भी नज़र आए हैं धुँदले 'ज़र्रीं'
आइना-ख़ानों से जो लोग सँवर कर निकले