उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum aise log shishe mein utar jate hain dil-dara

हम ऐसे लोग शीशे में उतर जाते हैं दिल-दारा

ہم ایسے لوگ شیشے میں اتر جاتے ہیں دل دارا

शायर: Idris Azad8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम ऐसे लोग शीशे में उतर जाते हैं दिल-दारा
छनक कर टूट जाते हैं बिखर जाते हैं दिल-दारा

हरा रहता है दुनिया में हर इक पौदा मोहब्बत का
जहाँ तक शाख़ जाती है समर जाते हैं दिल-दारा

हमारे दिल की चिंगारी को बस इक फूँक काफ़ी है
ज़ियादा साँस ले कोई तो डर जाते हैं दिल-दारा

बहुत दिन कह लिया हम तुम पे मरते तुम पे मरते हैं
बस अब की बार यूँ करते हैं मर जाते हैं दिल-दारा

हम अपने चौखटे में ही खड़े रहते हैं बे-जुम्बिश
हमारे पाँव से रस्ते गुज़र जाते हैं दिल-दारा

जड़ें मज़बूत रखने से ग़रज़ है अपने पौदों को
ये सर कटवाएँ तो उल्टा सँवर जाते हैं दिल-दारा

वहाँ तक जुस्तुजू बे-मिन्नत-ए-उम्मीद जाती है
जहाँ तक साथ सड़कों के शजर जाते हैं दिल-दारा

बस अब कुछ और तो लेना नहीं बाज़ार-ए-दुनिया से
दुकानें बंद होने को हैं घर जाते हैं दिल-दारा