उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum aaj apna muqaddar badal ke dekhte hain

हम आज अपना मुक़द्दर बदल के देखते हैं

ہم آج اپنا مقدر بدل کے دیکھتے ہیں

शायर: Nafas Ambalvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम आज अपना मुक़द्दर बदल के देखते हैं
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर चल के देखते हैं

उधर चराग़ बुझाने को है हवा बेताब
इधर ये ज़िद कि हवाओं में जल के देखते हैं

चलो फिर आज ज़मीनों में जज़्ब हो जाएँ
छलक के आँख से बाहर निकल के देखते हैं

ये इश्क़ कोई बला है जुनून है क्या है
ये कैसी आग है पत्थर पिघल के देखते हैं

अजीब प्यास है दरिया से बुझ नहीं पाई
जो तुम कहो तो समुंदर निगल के देखते हैं

वो गर निगाह मिला ले तो मो'जिज़ा कर दे
इसी लिए तो उधर हम सँभल के देखते हैं

बदल के ख़ुद ही हमीं रह गए ज़माने में
चले थे घर से कि दुनिया बदल के देखते हैं