उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hain uljhanen tamam meri zindagi ke sath

हैं उलझनें तमाम मिरी ज़िंदगी के साथ

ہیں الجھنیں تمام مری زندگی کے ساتھ

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हैं उलझनें तमाम मिरी ज़िंदगी के साथ
इंसाफ़ कर रहा हूँ मगर शा'इरी के साथ

ये और बात है मैं ज़ियादा न मिल सकूँ
मिलता नहीं किसी से मगर बे-दिली के साथ

काम आई तीरगी में चराग़ों की दोस्ती
गुज़री शब-ए-हयात मिरी रौशनी के साथ

बिखरे हुए वजूद को अपने समेट कर
हम जीना चाहते हैं बड़ी सादगी के साथ

है जिस का जैसा ज़र्फ़ वो वैसा किया करे
करते नहीं हैं हम तो दग़ा दोस्ती के साथ

'आलम' अमीर-ए-शहर भी करता है एहतिराम
रहते हैं इतनी शान से हम मुफ़लिसी के साथ