उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gumrahi ka meri saman hua jata hai

गुमरही का मिरी सामान हुआ जाता है

گمرہی کا مری سامان ہوا جاتا ہے

शायर: Obaidur Rahman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुमरही का मिरी सामान हुआ जाता है
रास्ता ज़ीस्त का आसान हुआ जाता है

इक तरफ़ रूह कि पर्वाज़ को जैसे तय्यार
इक तरफ़ जिस्म कि बे-जान हुआ जाता है

दश्त-ए-ग़ुर्बत है कि आबाद हमारे दम से
घर का आँगन है कि वीरान हुआ जाता है

क्यूँ न फिर धूप भी बन जाए घटा जब हम पर
आप का साया-ए-मिज़्गान हुआ जाता है

कह दिया आप ने क्या कान में चुपके से इसे
दिल में बरपा मिरे हैजान हुआ जाता है

आप की मेरी ही ग़ज़लों की हैं कतरन सारी
जिन से वो साहब-ए-दीवान हुआ जाता है

दी है चुपके से 'उबैद' उस ने लबों पर दस्तक
शोर बरपा तह-ए-शिरयान हुआ जाता है