उर्दू शायरी · ग़ज़ल

goshe badal badal ke har ek raat kaT di

गोशे बदल बदल के हर इक रात काट दी

گوشے بدل بدل کے ہر اک رات کاٹ دی

शायर: Tahir Faraz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गोशे बदल बदल के हर इक रात काट दी
कच्चे मकाँ में अब के भी बरसात काट दी

वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल
अफ़्सोस ये है उस ने मिरी बात काट दी

दिल भी लहूलुहान है आँखें भी हैं उदास
शायद अना ने शह-रग-ए-जज़्बात काट दी

जब भी हमें चराग़ मयस्सर न आ सका
सूरज के ज़िक्र से शब-ए-ज़ुल्मात काट दी

जादूगरी का खेल अधूरा ही रह गया
दरवेश ने शबीह-ए-तिलिस्मात काट दी

हालाँकि हम मिले थे बड़ी मुद्दतों के बा'द
औक़ात की कमी ने मुलाक़ात काट दी

ठंडी हवाएँ महकी फ़ज़ा नर्म चाँदनी
शब तो बस एक थी जो तिरे सात काट दी