उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghire hain chaaron taraf bekasi ke baadal phir

घिरे हैं चारों तरफ़ बेकसी के बादल फिर

گھرے ہیں چاروں طرف بیکسی کے بادل پھر

शायर: Rafia Shabnam Abidi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घिरे हैं चारों तरफ़ बेकसी के बादल फिर
सुलग रहा है सितारों भरा इक आँचल फिर

बस एक बार उन आँखों को उस ने चूमा था
हमेशा नम ही रहा आँसुओं से काजल फिर

ये कैसी आग है जो पोर पोर रौशन है
ये किस ने रख दी मिरी उँगलियों पे मशअ'ल फिर

फिर अब की बार लहू-रंग बारिशें बरसें
किसी ने काट दिए हैं सरों के जंगल फिर

रगों में तपती हुई ख़ुशबुएँ मचलने लगीं
मला बदन पे नए मौसमों ने संदल फिर

कहीं तो रेत से चश्मा निकल ही आएगा
भटक रहा है वो काँधों पे ले के छागल फिर

फिर उस अकेली भरी दोपहर ने झुलसा है
कि याद आने लगा सुब्ह से वो पागल फिर