उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghar kisi ka bhi ho jalta nahin dekha jata

घर किसी का भी हो जलता नहीं देखा जाता

گھر کسی کا بھی ہو جلتا نہیں دیکھا جاتا

शायर: Nafas Ambalvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घर किसी का भी हो जलता नहीं देखा जाता
हम से चुप रह के तमाशा नहीं देखा जाता

तेरी 'अज़्मत है तू चाहे तो समुंदर दे दे
माँगने वाले का कासा नहीं देखा जाता

जब से सहरा का सफ़र काट के घर लौटा हूँ
तब से कोई भी हो प्यासा नहीं देखा जाता

ये 'इबादत है 'इबादत में सियासत कैसी
इस में का'बा या कलीसा नहीं देखा जाता

मेरे लहजे पे न जा क़ौल का मफ़्हूम समझ
बात सच्ची हो तो लहजा नहीं देखा जाता

'अक्स उभरेगा 'नफ़स' गर्द हटा दे पहले
धुँदले आईने में चेहरा नहीं देखा जाता