उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghazab ki kaT thi ab ke hawa ke tanon mein

ग़ज़ब की काट थी अब के हवा के तानों में

غضب کی کاٹ تھی اب کے ہوا کے طعنوں میں

शायर: Rafiq Raaz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़ज़ब की काट थी अब के हवा के तानों में
शिगाफ़ पड़ गए हैं बे-ज़बाँ चटानों में

हमारे होंट ही पत्थर के हैं वगरना मियाँ
हम एक आग लिए फिरते हैं दहानों में

बगूला बन के उठा तो मैं था ख़राबे से
बपा हुआ न कोई हश्र आसमानों में

सियाह शहर की क़िस्मत में मेरा फ़ैज़ कहाँ
चराग़-ए-नज़्र हूँ जलता हूँ आस्तानों में

टपक पड़ा हूँ बिल-आख़िर मैं अपनी आँखों से
छुपा रखा था मुझे तुम ने किन ख़ज़ानों में

सुकूत को न कभी कर सदा से आलूदा
कि ये ज़बाँ है मुक़द्दस-तरीं ज़बानों में

सुख़न-शनास फ़सीलों का है सुकूत ग़ज़ब
सुख़न-तराज़ हैं ज़ंजीरें क़ैद-ख़ानों में