उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gaya ki sail-e-rawan ka bahaw aisa tha

गया कि सैल-ए-रवाँ का बहाव ऐसा था

گیا کہ سیل رواں کا بہاؤ ایسا تھا

शायर: Daniyal Tareer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गया कि सैल-ए-रवाँ का बहाव ऐसा था
वो एक ख़्वाब जो काग़ज़ की नाव ऐसा था

किसी को भी न था आसान साँस का लेना
मिरी ज़मीं पे हवा का दबाव ऐसा था

लहू की धार सलामत रही न साँस का तार
मुझे जो काट गया वो कटाव ऐसा था

वो टिमटिमाता तो उस की ज़िया भी कम पड़ती
किसी दिए से लहू का लगाव ऐसा था

वो एक था जो मुझे चार-सू दिखाई दिया
मैं जंग हार गया हूँ कि दाव ऐसा था

मुझे तो लाज के उजले लिबास में वो बदन
गुलाब बर्फ़ में जैसे छुपाओ ऐसा था

बने हैं नाग मिरे बन में पेड़ जितने थे
लगी है आग सबा का सुभाव ऐसा था