उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gharib aadmi ko ThaT padshahi ka

ग़रीब आदमी को ठाट पादशाही का

غریب آدمی کو ٹھاٹ پادشاہی کا

शायर: Parveen Umm-e-Mushtaq9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़रीब आदमी को ठाट पादशाही का
ये पेश-ख़ेमा है ज़ालिम तिरी तबाही का

ख़दंग-ए-आह को रोके रहा हूँ फ़ुर्क़त में
ख़याल है मुझे अफ़्लाक की तबाही का

उमीद कैसे हो महशर में सुर्ख़-रूई की
हमेशा काम किया हो जो रू-सियाही का

सलाम तक नहीं लेते कलाम तो कैसा
फ़क़ीरी में भी तबख़्तुर है बादशाही का

शिकस्त-ओ-फ़त्ह का ज़िम्मा नहीं दिल-ए-नादाँ
लड़े हज़ार में ये काम है सिपाही का

ख़िज़ाब करते हैं दुनिया से जब गए गुज़रे
शुगून करते हैं पीरी में रू-सियाही का

न आसमाँ की इनायत न मेहरबाँ वो शोख़
न पूछो हाल ग़रीबों की बे-पनाही का

सफ़ेद बालों पे किस वास्ते ख़िज़ाब लगाएँ
गया ज़माना जवानी में रू-सियाही का

ख़ताएँ हो गईं मा'दूम हज से ऐ 'परवीं'
गवाह ख़ुद है ख़ुदा मेरी बे-गुनाही का