उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham-e-hayat mein jaise bhi zindagi ki hai

ग़म-ए-हयात में जैसे भी ज़िंदगी की है

غم حیات میں جیسے بھی زندگی کی ہے

शायर: Daud Ghazi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़म-ए-हयात में जैसे भी ज़िंदगी की है
तुम्हारी याद तो लेकिन कभी कभी की है

जो ग़म मिला था तो ये चाहा ग़म-ए-ज़ियाद मिले
सियाह शब में तमन्ना-ए-रौशनी की है

हयात साथ में लाई है मौत का सामाँ
किसी ने हम से बहुत ख़ूब दिल-लगी की है

ये ग़म की रात नहीं जिस की इंतिहा कोई
तिरे बग़ैर बसर कुछ अजीब सी की है

निगाह-ए-यार का इस में कोई क़ुसूर नहीं
कि हम ने दिल की ख़राबी तो आप ही की है