उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gali se apni uThata hai wo bahane se

गली से अपनी उठाता है वो बहाने से

گلی سے اپنی اٹھاتا ہے وہ بہانے سے

शायर: Ejaz Gul5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गली से अपनी उठाता है वो बहाने से
मैं बे-ख़बर रहूँ दुनिया के आने जाने से

कभी कभी तो ग़नीमत है याद रफ़्ता की
बिठा न रोज़ लगा के उसे सिरहाने से

अजीब शख़्स था मैं भी भुला नहीं पाया
किया न उस ने भी इंकार याद आने से

उठा रखी है किसी ने कमान सूरज की
गिरा रहा है मिरे रात दिन निशाने से

कोई सबब तो है ऐसा कि एक उम्र से हैं
ज़माना मुझ से ख़फ़ा और मैं ज़माने से