उर्दू शायरी · ग़ज़ल

farsh-e-maKHmal pe kabhi nind na aai mujhko

फ़र्श-ए-मख़मल पे कभी नींद न आई मुझ को

فرش مخمل پہ کبھی نیند نہ آئی مجھ کو

शायर: Aalam Nizami5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़र्श-ए-मख़मल पे कभी नींद न आई मुझ को
इतनी रास आई मिरे घर की चटाई मुझ को

बात साहिल की जो होती तो सँभल भी जाता
उस ने मंजधार में औक़ात बताई मुझ को

अज़्म पर मेरे मुसल्लत है जुनूँ मंज़िल का
कैसे रोकेगी मिरी आबला-पाई मुझ को

जिस ने जिस तरह से चाहा मुझे बदनाम किया
रास आई नहीं दुनिया की भलाई मुझ को

ज़ुल्मत-ए-शब में मैं तन्हा ही लड़ूँगा 'आलम'
इन चराग़ों ने अगर आँख दिखाई मुझ को