उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dusra ishq meri jaan nahin kar sakta

दूसरा इश्क़ मिरी जान नहीं कर सकता

دوسرا عشق مری جان نہیں کر سکتا

शायर: Aal-e-Umar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दूसरा इश्क़ मिरी जान नहीं कर सकता
ये तिरा हाफ़िज़-ए-क़ुरआन नहीं कर सकता

ऐसी हालत में तिरे ख़्वाब से लौटा है ये जिस्म
मैं अभी वस्ल का सामान नहीं कर सकता

दस्तरस में है मिरी कैफ़ भी कैफ़ियत भी
ज़ख़्म भर कर मुझे हैरान नहीं कर सकता

उन पे ग़ालिब है कई चेहरों के इशराक़ का दीन
तू इन आँखों को मुसलमान नहीं कर सकता

पहली क़िस्तों में तिरी मौत नहीं हो सकती
अपने थेटर को में वीरान नहीं कर सकता

ये मिरा आख़िरी पत्थर है तिरी याद में दोस्त
अब मैं पानी को परेशान नहीं कर सकता