उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dilon ke zaKHm bharte kyun nahin hain

दिलों के ज़ख़्म भरते क्यूँ नहीं हैं

دلوں کے زخم بھرتے کیوں نہیں ہیں

शायर: Obaid Haris6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिलों के ज़ख़्म भरते क्यूँ नहीं हैं
हम इस पर ग़ौर करते क्यूँ नहीं हैं

दग़ा दे कर निकल जाती है आगे
ख़ुशी से लोग डरते क्यूँ नहीं हैं

तिजारत क्यूँ अधूरी है हमारी
हमारे नाप भरते क्यूँ नहीं हैं

किसी ने भी न पूछा दुश्मनों से
मोहब्बत आप करते क्यूँ नहीं हैं

हमारी ज़िंदगी है मौत जैसी
यही सच है तो मरते क्यूँ नहीं हैं

नज़र औरों पे क्यूँ रहती है 'हारिस'
हम अपना काम करते क्यूँ नहीं हैं