उर्दू शायरी · ग़ज़ल

diwar-o-dar ko aur bhi viran kar gae

दीवार-ओ-दर को और भी वीरान कर गए

دیوار و در کو اور بھی ویران کر گئے

शायर: Madhavi Shankar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दीवार-ओ-दर को और भी वीरान कर गए
वो सब बिछड़ने वाले बिछड़ कर किधर गए

इन मुश्किलों ने काम ये आसान कर दिया
कुछ लोग वक़्त रहते ही दिल से उतर गए

काँटा सही मैं शाख़ पे अपनी जगह तो हूँ
नाज़ुक वो गुल तमाम हवा से बिखर गए

तारी रहा सुकूत मिरे घर में देर तक
आवाज़ें अपनी छोड़ के जब दोस्त घर गए

हर चीज़ शहर-ए-इश्क़ में महँगी थी इस क़दर
लौट आए ख़ाली हाथ ही जब जब उधर गए

हम थे अना-परस्त सो रोका नहीं उसे
पर उस के लौट आने की ख़्वाहिश में मर गए