उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chhupaya koi bhi gham to chhalak gain aankhen

छुपाया कोई भी ग़म तो छलक गईं आँखें

چھپایا کوئی بھی غم تو چھلک گئیں آنکھیں

शायर: Madhavi Shankar4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

छुपाया कोई भी ग़म तो छलक गईं आँखें
ये दिल तो है मिरे बस में मगर नहीं आँखें

मैं उस को जाते हुए देखती रही कुछ देर
फिर इक मक़ाम पे मुझ से बिछड़ गईं आँखें

सजे ही रहते हैं पलकों पे काँच के मोती
तुम्हारे ग़म ने बना दीं बहुत हसीं आँखें

इसी उमीद पे रक़्साँ है ये बदन कब से
कभी तो देख लें मुझ को वो दिल-नशीं आँखें