उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dhup khiDki se sirhane aai

धूप खिड़की से सिरहाने आई

دھوپ کھڑکی سے سرہانے آئی

शायर: Parveen Kaif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

धूप खिड़की से सिरहाने आई
चाँद ख़्वाबों के बुझाने आई

हाए वो फूल से हँसते चेहरे
याद फिर उन की रुलाने आई

दिल चराग़ों के अभी लर्ज़ां हैं
फिर हवा होश उड़ाने आई

दिल सुलगता था शब-ए-ग़म यूँही
चाँदनी और जलाने आई

उठ हुई सुब्ह-ए-अज़ाँ की आवाज़
नींद से मुझ को जगाने आई

ओढ़ ली तू ने बरहना तहज़ीब
शर्म तुझ को न ज़माने आई

और 'परवीन' से हुज्जत कीजे
आप की अक़्ल ठिकाने आई