उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab wo aangan wo ghar na khaprelen

अब वो आँगन वो घर न खपरेलें

اب وہ آنگن وہ گھر نہ کھپریلیں

शायर: Parveen Kaif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब वो आँगन वो घर न खपरेलें
पेड़ पंछी न फूल और बेलें

ज़िंदगी हम तिरे मुहाफ़िज़ हैं
क्यों न फिर अपनी जान पर खेलें

आसमाँ से हुमकता रहता है
चाँद को लाओ गोद में ले लें

अपने घर की घुटन ही बेहतर है
हिजरतों का 'अज़ाब क्यों झेलें

वज़्न पर हों ग़ज़ल के सब मिसरे
पीढ़ियों से न उतरीं ये रेलें

क्या जराइम का सद्द-ए-बाब हुआ
और आबाद हो गईं जेलें

अब तो सस्ती है शा'इरी 'परवीन'
लगती रहती हैं आए दिन सेलें