उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chand par kyon main akeli jati

चाँद पर क्यों मैं अकेली जाती

چاند پر کیوں میں اکیلی جاتی

शायर: Parveen Kaif8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चाँद पर क्यों मैं अकेली जाती
साथ कोई तो सहेली जाती

आओ मिल-जुल के सहें हिज्र की धूप
मुझ से तन्हा नहीं झेली जाती

बोलना मुझ से न तुम बंद करो
हर तरफ़ बात है फैली जाती

हम अगर अक़्ल को दरबाँ करते
हाथ से दिल की हवेली जाती

हाए संदल के दरख़्तों की ये राख
जान ख़ुशबू की न ले ली जाती

बन तो सकता था नया इक कमरा
अपने आँगन की चमेली जाती

प्यास जाती न अगर साहिल पर
क्यों समुंदर में अकेली जाती

चाँद झाँके जो किचन में 'परवीन'
मुझ से रोटी नहीं बेली जाती