उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dard-o-gham zamane ke aur ek ji tanha

दर्द-ओ-ग़म ज़माने के और एक जी तन्हा

درد و غم زمانے کے اور ایک جی تنہا

शायर: Rafiq Khawar Jaskani8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर्द-ओ-ग़म ज़माने के और एक जी तन्हा
आँधियों में जलती है शम-ए-ज़िंदगी तन्हा

अपनी अपनी राहें हैं अपनी अपनी मंज़िल है
कार-गाह-ए-हस्ती में रहते हैं सभी तन्हा

शब से दाग़-ए-हिज्राँ का वास्ता अजब शय है
तेरी दिलकशी तन्हा मेरी बेकली तन्हा

हाए उस ज़माने में अहल-ए-फ़न की बे-क़दरी
मौसम-ए-ज़मिस्ताँ में जैसे चाँदनी तन्हा

जाने दिल की धड़कन में क्या फ़रेब होता है
तुझ से बात करते हैं हम कभी कभी तन्हा

रहगुज़र पे सजती है अपनी बज़्म-ए-तन्हाई
तेरी नक़्श-ए-पा तन्हा मेरी बे-ख़ुदी तन्हा

हुस्न-ओ-इश्क़ की तक़दीर इक तज़ाद बाहम है
उन की शाम भी महफ़िल अपनी सुब्ह भी तन्हा

कौन किस की सुनता है ऐसे दौर में 'ख़ावर'
हम ने दूर छेड़ी है ग़म की रागनी तन्हा