उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dar-ba-dar ho ke dar se TuT gaya

दर-ब-दर हो के दर से टूट गया

دربدر ہو کے در سے ٹوٹ گیا

शायर: Nafas Ambalvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर-ब-दर हो के दर से टूट गया
मैं तो जैसे सफ़र से टूट गया

ढल गई शाम अब कहाँ जाऊँ
जो त'अल्लुक़ था घर से टूट गया

कुछ ख़बर भी है इन हवाओं को
ज़र्द पट्टा शजर से टूट गया

कोई हद भी तो हो बिखरने की
ख़्वाब देखा तो डर से टूट गया

तुम ने नाहक़ उठा लिए पत्थर
आइना तो नज़र से टूट गया

अह्द ये था कि साथ चलना है
फिर बशर ही बशर से टूट गया