उर्दू शायरी · ग़ज़ल

danista kabhi aisi himaqat nahin karta

दानिस्ता कभी ऐसी हिमाक़त नहीं करता

دانستہ کبھی ایسی حماقت نہیں کرتا

शायर: Aalam Nizami5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दानिस्ता कभी ऐसी हिमाक़त नहीं करता
फ़नकार हूँ तौहीन-ए-मोहब्बत नहीं करता

क्या रास उसे आएगी दस्तार-ए-फ़ज़ीलत
जो अपने उसूलों की हिफ़ाज़त नहीं करता

इस दौर में हम उस को फ़रिश्ता ही कहेंगे
फ़ाक़ों में जो ग़ैरत की तिजारत नहीं करता

तूफ़ान से लड़ने का अगर शौक़ न होता
मैं ‘अज़्मत-ए-साहिल से बग़ावत नहीं करता

शायद है 'अज़ीज़ उस को मिरी मुफ़लिसी 'आलम'
वो मेरे मुक़द्दर की मरम्मत नहीं करता