उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chashm-e-tar ko zaban kar baiThe

चश्म-ए-तर को ज़बान कर बैठे

چشم تر کو زبان کر بیٹھے

शायर: Iftikhar Raghib6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चश्म-ए-तर को ज़बान कर बैठे
हाल दिल का बयान कर बैठे

तुम ने रस्मन मुझे सलाम किया
लोग क्या क्या गुमान कर बैठे

एक पल भी कहाँ सुकून मिला
आप को जब से जान कर बैठे

पस्तियों में कभी गिरा डाला
और कभी आसमान कर बैठे

आस की शम' टिमटिमाती रही
हम कहाँ हार मान कर बैठे

एक पल का यक़ीं नहीं 'राग़िब'
इक सदी का प्लान कर बैठे