उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chahta jo bhi hai wo kah ke guzar jata hai

चाहता जो भी है वो कह के गुज़र जाता है

چاہتا جو بھی ہے وہ کہہ کے گزر جاتا ہے

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शीर्षक की यह संग्रह प्रविष्टि 2 है। समान शीर्षक के रिकॉर्ड में पाठ या श्रेय का अंतर है; इसे स्वतंत्र आधिकारिक संस्करण का दावा न मानें। अन्य संग्रह प्रविष्टि 1

चाहता जो भी है वो कह के गुज़र जाता है
दिल-ए-हस्सास इस एहसास से मर जाता है

ज़ेहन में बात बुज़ुर्गों की तभी बैठती है
जब जवानी का नशा सर से उतर जाता है

जब अना मेरी ज़रूरत का गला घोंटती है
रंग ख़ुद-दारी के चेहरे का निखर जाता है

डसने लगती है मिरी ख़ाना-बदोशी मुझ को
जब कोई पंछी कभी शाम को घर जाता है

झूटी तारीफ़ से होती है मसर्रत उस को
आइना कोई दिखा दे तो बिफर जाता है

जुर्म करता है कोई और यहाँ पर 'आलम'
और इल्ज़ाम किसी और के सर जाता है