उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bu-e-gul sungh kar bigaDte hain

बू-ए-गुल सूँघ कर बिगड़ते हैं

بوئے گل سونگھ کر بگڑتے ہیں

शायर: Lala Madhav Ram Jauhar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बू-ए-गुल सूँघ कर बिगड़ते हैं
ये परी-रू हवा से लड़ते हैं

क्यूँ जवानी के पीछे पड़ते हैं
भागते को नहीं पकड़ते हैं

एक दिन वो ज़मीन देखेंगे
ऐ फ़लक आज को अकड़ते हैं

मल रहे हैं वो अपने घर मेहंदी
हम यहाँ एड़ियाँ रगड़ते हैं

नामा-बर ना-उमीद आता है
हाए क्या सुस्त पाँव पड़ते हैं

जिस के हैं उस के हैं हम ऐ जौहर
यार बन कर कहीं बिगड़ते हैं