उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bekasi jab kisi bazar mein aa jati hai

बेकसी जब किसी बाज़ार में आ जाती है

بیکسی جب کسی بازار میں آ جاتی ہے

शायर: Nafas Ambalvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बेकसी जब किसी बाज़ार में आ जाती है
इक हवस जैसे ख़रीदार में आ जाती है

रात-भर चीख़ती फिरती है ख़बर बस्ती में
फिर तड़पती हुई अख़बार में आ जाती है

मेरा हम-साया भी रोता है जो अपने घर में
इक नमी सी मिरी दीवार में आ जाती है

हम तो सूखे हुए दरिया में भी उतरे लेकिन
अपनी कश्ती है कि मंजधार में आ जाती है

दर्द तो दिल से ज़बाँ तक भी नहीं आ पाया
फिर भी तल्ख़ी है कि अश'आर में आ जाती है

जो मिरे दिल पे गुज़रती है तुझे क्या मा'लूम
जब रज़ा भी तिरे इंकार में आ जाती है

माह-ए-रमज़ान में रंजिश भी मोहब्बत बन कर
मुस्कुराती हुई इफ़्तार में आ जाती है

ये जो हर बात पे तुम आह सी भरते हो 'नफ़स'
इक 'अलामत है जो बीमार में आ जाती है