उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-sabab humse wo bezar nazar aate hain

बे-सबब हम से वो बेज़ार नज़र आते हैं

بے سبب ہم سے وہ بیزار نظر آتے ہیں

शायर: Sabiha Khan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-सबब हम से वो बेज़ार नज़र आते हैं
दुख के हर चार सू अम्बार नज़र आते हैं

कल तलक जिन को थी हम से निस्बत हमदम
आज ग़ैरों के तलबगार नज़र आते हैं

जब भी तारीख़ के औराक़ पलट कर देखूँ
'अज़्मत-ए-रफ़्ता के मीनार नज़र आते हैं

किस को फ़ुर्सत है यहाँ दूसरों के ग़म बाँटे
लोग ख़ुशियों के ख़रीदार नज़र आते हैं

गर्द में कारवाँ की आज मुझे मुबहम से
दूर मंज़िल के कुछ आसार नज़र आते हैं

ख़ैर की जिन से किसी को न थी कोई उम्मीद
वो भी अब माइल-ए-ईसार नज़र आते हैं

आख़िरश गुज़री 'सबीहा; ये अँधेरी शब भी
ख़ैर से सुब्ह के आसार नज़र आते हैं