उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ba-zahir Thik lagte ho magar ye aankh kyon nam hai

ब-ज़ाहिर ठीक लगते हो मगर ये आँख क्यों नम है

بظاہر ٹھیک لگتے ہو مگر یہ آنکھ کیوں نم ہے

शायर: Omaima Yusuf6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ब-ज़ाहिर ठीक लगते हो मगर ये आँख क्यों नम है
ख़ुशी पर रो दिए हो क्यों तुम्हें किस बात का ग़म है

कभी हँसती हुई नम आँख देखोगे तो समझोगे
हैं ग़म की सूरतें कितनी ख़ुशी के बाद भी ग़म है

अज़िय्यत झेलनी होगी यहाँ बस आख़िरी दम तक
जहाँ में जिस क़दर जितना जिसे है आरज़ी ग़म है

दिया मस्लक का जलता है दिल-ए-मुस्लिम की राहों में
जहाँ रौशन तो है लेकिन अभी भी रौशनी कम है

यहाँ वा'दे निभाने का कहेंगे आख़िरी दम तक
किसे मालूम कब किस का यहाँ पर आख़िरी दम है

हुनर से दुख कुरेदें तब कहीं अशआ'र बनते हैं
रसाई कम सही लेकिन तुम्हारी दाद भी कम है