उर्दू शायरी · ग़ज़ल

afsos ki dandan ka kiya rizq falak ne

अफ़्सोस कि दंदाँ का किया रिज़्क़ फ़लक ने

افسوس کہ دنداں کا کیا رزق فلک نے (ردیف .. ت)

शायर: Mirza Ghalib11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अफ़्सोस कि दंदाँ का किया रिज़्क़ फ़लक ने
जिन लोगों की थी दर-ख़ुर-ए-अक़्द-ए-गुहर अंगुश्त

काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना
ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त

लिखता हूँ 'असद' सोज़िश-ए-दिल से सुख़न-ए-गर्म
ता रख न सके कोई मिरे हर्फ़ पर अंगुश्त

जाता हूँ जिधर सब की उठे है उधर अंगुश्त
यक-दस्त जहाँ मुझ से फिरा है मगर अंगुश्त

मिज़्गाँ की मोहब्बत में जो अंगुश्त-नुमा हूँ
लगती है मुझे तीर के मानिंद हर अंगुश्त

हर ग़ुंचा-ए-गुल सूरत-ए-यक-क़तरा-ए-ख़ूँ है
देखा है किसू का जो हिना-बस्ता सर-ए-अंगुश्त

गर्मी है ज़बाँ की सबब-ए-सोख़्तन-ए-जाँ
हर शम' शहादत को है याँ सर-बसर अंगुश्त

ख़ूँ दिल में जो मेरे नहीं बाक़ी तो 'अजब क्या
जूँ माही-ए-बे-आब तड़पती है हर अंगुश्त

शोख़ी तिरी कह देती है अहवाल हमारा
राज़-ए-दिल-ए-सद-पारा की है पर्दा दर-ए-अंगुश्त

किस रुत्बा में बारीकी-ओ-नर्मी है कि जूँ गुल
आती नहीं पंजा में बस इस के नज़र अंगुश्त

मैं उल्फ़त-ए-मिज़्गाँ में जो अंगुश्त नुमा हूँ
लगती है मुझे तीर के मानिंद हर अंगुश्त