उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankhon mein jab se ruh-e-basarat nahin rahi

आँखों में जब से रूह-ए-बसारत नहीं रही

آنکھوں میں جب سے روح بصارت نہیں رہی

शायर: Owais Jamal Shamsi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँखों में जब से रूह-ए-बसारत नहीं रही
ख़्वाबों को भी लिबास की हाजत नहीं रही

वो प्यार वो ख़ुलूस वो चाहत नहीं रही
पहली की भाइयों में मोहब्बत नहीं रही

तो भी फ़रेब-ए-ज़ात से बाहर न आ सका
मुझ में भी ए'तिमाद की ताक़त नहीं रही

अच्छा किया है आप ने दिल मेरा तोड़ कर
आईना तोड़ने की ज़रूरत नहीं रही

सड़कों ने पहन रक्खा है सहराओं का लिबास
लगता है अब लहू की तिजारत नहीं रही

दिल ज़ख़्म ज़ख़्म हो गया मुद्दत हुई जनाब
गुलदान को गुलों की ज़रूरत नहीं रही

जज़्बे बग़ावतों में हुए कामयाब 'ओवैस'
अब शह्र-ए-दिल पर उन की हुकूमत नहीं रही