उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aai qarib sham to aisa laga charagh

आई क़रीब शाम तो ऐसा लगा चराग़

آئی قریب شام تو ایسا لگا چراغ

शायर: Pandit Aks Lucknowi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आई क़रीब शाम तो ऐसा लगा चराग़
अपनी ही रौशनी से नहीं आश्ना चराग़

सकते में लोग आ गए रौशन हुआ ख़याल
जैसे सभी के वास्ते मंज़र हुआ चराग़

अल्फ़ाज़ उन के देने लगे रौशनी तमाम
तारीफ़ में चराग़ की जब भी कहा चराग़

माथे पे था पसीना बदन भी था चूर-चूर
था गेसूओं में रात की उलझा हुआ चराग़

था उस के तेवरों में जुनूँ इंक़लाब का
जो आँधियों के ताक़ में जलता रहा चराग़

वहशत के दाएरे में कई ज़िंदगी तमाम
जुगनू की ज़िंदगी को मैं लिखता रहा चराग़

ऐ 'अक्स' खिड़कियों को खुला छोड़ दे ज़रा
कमरे के बंद घेरों से घबरा गया चराग़