नात लिरिक्स

Zaban-o-Gosh Ko Saare Gunahon Se Safa Kar Den | Muanawwar Meri Aankhon Ko Mere Shamsudduha Kar Den With Tazmeen

ज़बान-ओ-गोश को सारे गुनाहों से सफ़ा कर दें | मुनव्वर मेरी आँखों को मेरे शम्सुद्दुहा कर दें तज़मीन के साथ

नात ख़्वान: मुहम्मद रफ़ीक़ रज़ा क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

ज़बान-ओ-गोश को सारे गुनाहों से सफ़ा कर देंजबीन-ए-'इश्क़ को रौशन मेरी बहर-ए-ख़ुदा कर देंमेरे क़ल्ब-ओ-जिगर को, मेरे आक़ा ! बा-वफ़ा कर देंमुनव्वर मेरी आँखों को, मेरे शम्सुद्दुहा ! कर देंग़मों की धूप में वो साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता कर दें

मेरे सिद्दीक़-ए-अकबर को इमाम-उल-अतक़िया कर दें'उमर, 'उस्मान को 'अद्ल-ओ-वफ़ा का आईना कर दें'अली को मिस्ल-ए-हारूँ अपना नाइब मुस्तफ़ा कर देंजहाँ-बानी 'अता कर दें, भरी जन्नत हिबा कर देंनबी मुख़्तार-ए-कुल हैं, जिस को जो चाहें 'अता कर दें

मसीह-ए-पाक जिस को दम से जान-ए-नौ 'अता कर देंमेरे मुख़्तार आक़ा उस को ठोकर से अदा कर देंमेहर पलटे, क़मर शक़ हो, इशारा गर शहा कर देंजहाँ में उन की चलती है, वो दम में क्या से क्या कर देंज़मीं को आसमाँ कर दें, सुरय्या को सरा कर दें

गिरफ़्तार-ए-मुसीबत को वो पल भर में छुड़ाते हैंजिसे जब चाहते हैं अपने रौज़े पर बुलाते हैंओवैस-ओ-हज़रत-ए-हब्शी की तमसीलें दिखाते हैंकिसी को वो हँसाते हैं, किसी को वो रुलाते हैंवो यूँही आज़माते हैं, वो अब तो फ़ैसला कर दें

वहाबी देव के बंदो से उक्ता सी गई दुनियारवाफ़िज़ की शरर-बाज़ी से उक्ता सी गई दुनियासुल्ह-ए-कुल ख़ानक़ाहों से भी उक्ता सी गई दुनियासग-ए-आवारा-ए-सहरा से उक्ता सी गई दुनियाबचाओ अब ज़माने का सगान-ए-मुस्तफ़ा कर दें

मुनव्वर 'अर्श को भी कर गया नक़्श-ए-क़दम जिन काबना जिन का न साया, कैसे फिर ख़ाका बने उन कालक़ब शम्सुद्दुहा, बदरुद्दुजा, नूर-उल-हुदा उन कातबस्सुम से गुमाँ गुज़रे शब-ए-तारीक पर दिन काज़िया-ए-रुख़ से दीवारों को रौशन आईना कर दें

चलो, ऐ सुन्नियो ! गुस्ताख़ का क़ल'आ-क़मा' कर देंनबी की 'अज़मत-ओ-नामूस पर सब कुछ फ़िदा कर देंसहाबा, औलिया से अपने रिश्तों को खरा कर देंजहाँ में 'आम पैग़ाम-ए-शह-ए-अहमद-रज़ा कर देंपलट कर पीछे देखें फिर से तज्दीद-ए-वफ़ा कर दें

मेरे अहबाब ! आओ आज मिल कर इक सदा कर देंनबी का जो हमारा वो ये अहद-ए-बा-वफ़ा कर देंइमाम अहमद रज़ा के मस्लक-ए-हक़ की जिला कर देंनबी से जो हो बेगाना, उसे दिल से जुदा कर देंपिदर, मादर, बिरादर, माल-ओ-जाँ उन पर फ़िदा कर दें

भला आएँगी कैसे अब बलाएँ, क़ादरी ! तुझ परहुज़ूर-ए-क़ाइद-ए-मिल्लत का दस्त-ए-फ़ैज़ है तुझ परबलाओं को भगाता हूँ हमेशा शे'र ये पढ़ करमुझे क्या फ़िक्र हो, अख़्तर ! मेरे यावर हैं वो यावरबलाओं को मेरी जो ख़ुद गिरफ़्तार-ए-बला कर दें

कलाम:मुफ़्ती अख़्तर रज़ा ख़ान

तज़मीन:मुहम्मद रफ़ीक़ रज़ा क़ादरी

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