ये मो'जिज़ा रसूल-ए-ख़ुदा ने दिखा दियामुट्ठी में कंकरी को भी कलमा पढ़ा दिया
राह-ए-ख़ुदा में दे के ख़दीजा ने माल-ओ-ज़रमक्के के हर ग़रीब का चूल्हा जला दिया
बू-जहल बेचता था जो अंधों को आईनाआक़ा ने उस दुकान में ताला लगा दिया
अपने गले लगा के नबी ने बिलाल कोदुनिया से काले गोरे का झगड़ा मिटा दिया
बंजर ज़मीं पे खेती ऊगा दी गुलाब कीकुएँ के खारे पानी को मीठा बना दिया
'तब्बत यदा' की ज़द में जो आया अबू-लहबउस को ख़ुदा के क़हर ने लूला बना दिया
वो आख़री अज़ान थी हिज्र-ए-रसूल मेंरो कर मेरे बिलाल ने सब को रुला दिया
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