नात लिरिक्स

Yaad Aate Hain Manzar Haram Ke | Jab Bhi Aata Hai Hajj Ka Mahina

याद आते हैं मंज़र हरम के | जब भी आता है हज का महीना

नात ख़्वान: उमैर ज़ुबैरशायर: सुहैल कलीम फ़ारूक़ीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

कभी तो दूँगा मैं जा कर सदाएँ ख़ान-ए-का'बा मेंकरूँगा मैं भी, फ़ारूक़ी ! दु'आएँ ख़ान-ए-का'बा में

लब्बैक लब्बैक अल्लाहुम्म लब्बैकलब्बैक लब्बैक अल्लाहुम्म लब्बैकलब्बैक लब्बैक अल्लाहुम्म लब्बैक

याद आते हैं मंज़र हरम के, जब भी आता है हज का महीनारूह का'बे के जल्वों को तरसे, दिल पुकारे मदीना मदीना

याद आते हैं मंज़र हरम के, जब भी आता है हज का महीना

मैं भी देखूँ सफ़ा और मरवा, मैं भी या मौला ! घर तेरे आऊँबीबी ज़हरा के बच्चों का सदक़ा, पार हो अब मेरा भी सफ़ीना

याद आते हैं मंज़र हरम के, जब भी आता है हज का महीना

हाजिओ ! उन के दर पर भी जाओ, जिन को मालिक ने मालिक बनायाजो हैं सुलतान दोनों जहाँ के, जिन के क़दमों में है हर ख़ज़ीना

याद आते हैं मंज़र हरम के, जब भी आता है हज का महीना

बे-मज़ा है ज़माने की रौनक़, सारी रा'नाइयाँ बे-असर हैंमैं मदीने की यादों में गुम हूँ, हिज्र-ए-तयबा में ज़ख़्मी है सीना

याद आते हैं मंज़र हरम के, जब भी आता है हज का महीना

दूर, फ़ारूक़ी ! आक़ा के दर से, दूर फ़ारूक़ी ! तयबा नगर सेमुझ को बे-रंग लगती है दुनिया, मुझ को बे-कार लगता है जीना

याद आते हैं मंज़र हरम के, जब भी आता है हज का महीना

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