नात लिरिक्स

Ya Rabbana Irhamlana | Tere Ghar Ke Phere Lagata Rahun Main

या रब्बना इर्हम-लना | तेरे घर के फेरे लगाता रहूँ मैं

नात ख़्वान: अल्लामा हाफिज़ बिलाल क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

तेरे घर के फेरे लगाता रहूँ मैंसदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

हरम में, मैं हाज़िर हुआ बन के मुजरिमये लब्बैक ना'रा लगाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

मैं लेता रहूँ बोसा-ए-संग-ए-अस्वदयूँ दिल की सियाही मिटाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

इलाही ! मैं फिरता रहूँ गिर्द-ए-का'बायूँ क़िस्मत की गर्दिश मिटाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

लिपट कर गले लग के मैं मुल्तज़म सेगुनाहों के धब्बे मिटाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

बराहीम के नक़्श-ए-पा चूम कर मैंनिगाहों से दिल में बसाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

हतीम-ए-हरम में नमाज़ों को पढ़ करतेरे दर पे दुखड़े सुनाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

मैं पीता रहूँ हर घड़ी आब-ए-ज़मज़मलगी अपने दिल की बुझाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

सफ़ा और मरवा के मा-बैन दौड़ूँस'ई कर के तुझ को मनाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

झुकी जिन के सज्दे को मेहराब-ए-का'बावहीं दिल अदब से झुकाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

बरस्ती है बारान-ए-रहमत हरम मेंतो मीज़ाब-ए-ज़र से नहाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

मुज़्दल्फ़ा में वक़्त-ए-सहर मुस्कुरा करये सुन्नत नबी की बताता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

रमी कर के जमरात की मैं मिना मेंतेरे दुश्मनों को मिटाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

तू शर से पनाह दे, मुक़द्दर हो ऐसाकि बस ख़ैर ही ख़ैर पाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

सनद हज्ज-ए-मबरूर की लेने हाज़िरमुहम्मद की चौखट पे जाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

हो मक़बूल हज हाज़िरी दाइमी मेंपस-ए-हज मदीने को जाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

इलाही ! तू ऐसा मुक़द्दर 'अता करहमेशा ही तयबा में आता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

इलाही तू क़िस्मत दे सौर-ओ-हिरा कीकि इस दिल में आक़ा को पाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

है सय्यद की ख़्वाइश मदीने में मर करहमेशा की जन्नत को पाता रहूँ मैं

सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना

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