नात लिरिक्स

Wo Bareilly Ka Ahmad Raza Hai | Wo Bareli Ka Ahmad Raza Hai

वो बरेली का अहमद रज़ा है

नात ख़्वान: आबिद अय्यूब क़ादरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

ग़ौस-ए-आ'ज़म का दीवानावो है ख़्वाजा का मस्तानाजो मुहम्मद पे दिल से फ़िदा हैवो बरेली का अहमद रज़ा है

दस्वीं तारीख़ थी, माह-ए-शव्वाल थाघर नक़ी ख़ान के बेटा पैदा हुआनाम अहमद रज़ा जिस का रखा गयाआ'ला हज़रत ज़माने का वो बन गयावो मुजद्दिद-ए-ज़माना, 'इल्म-ओ-हिकमत का ख़ज़ानाजिस ने बचपन में फ़तवा दिया हैवो बरेली का अहमद रज़ा है

जब वो पैदा हुआ नूरी साए तलेवादी-ए-नज्द में आ गए ज़लज़लेकैसे उस की फ़ज़ीलत का सूरज ढलेजिस की 'अज़मत का सिक्का 'अरब में चलेजिस का खाएँ उस का गाएँ, उस का ना'रा हम लगाएँजिस का ना'रा 'अरब में लगा हैवो बरेली का अहमद रज़ा है

जब रज़ा ख़ाँ को बै'अत की ख़्वाहिश हुईपहुँचे मारहरा वो 'उम्र बाईस की थीफ़ैज़-ए-बरकात से ऐसी बरकत मिलीसाथ बै'अत के फ़ौरन ख़िलाफ़त मिलीआ'ला हज़रत उन को तन्हा सिर्फ़ मैं ही नहीं कहताअच्छे अच्छों को कहना पड़ा हैवो बरेली का अहमद रज़ा है

उस मुजद्दिद ने लिक्खा है ऐसा सलामजिस को कहती है दुनिया इमामुल-कलामपढ़ रहे हैं फरिश्ते जिसे सुब्ह-ओ-शाममुस्तफ़ा जान-ए-रहमत पे लाखों सलामप्यारा प्यारा ये सलाम, किस ने लिखा ये कलाम?पूछते क्या हो सब को पता हैवो बरेली का अहमद रज़ा है

मस्लक-ए-बू-हनीफ़ा का ए'लान हैमस्लक-ए-आ'ला हज़रत मेरी शान हैजो उलझता है इस से वो नादान हैवो तो इन्साँ नहीं बल्कि शैतान हैबू-हनीफ़ा ने जो लिखा, आ'ला हज़रत ने बतायाकौन कहता है मस्लक नया हैवो बरेली का अहमद रज़ा है

नज्दियत का ख़सारा बरेली में हैसुन्नियत का सहारा बरेली में हैग़ौस-ए-आ'ज़म का प्यारा बरेली में हैआ'ला हज़रत हमारा बरेली में हैजिस ने नज्दी को मारा बरेली में हैजो किसी से न हारा बरेली में हैअहल-ए-सुन्नत का इमाम, ये रज़ा है उस का नामनज्दियों से जो तन्हा लड़ा हैवो बरेली का अहमद रज़ा है

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