उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँदीवाना तेरे दर का, कहता सुना गया हूँ
उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँ
जब से मिली ग़ुलामी, मैं सुर्ख़-रू हुआ हूँमैं तेरा नाम ले कर आ'लम पे छा गया हूँ
उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँ
मुद्दत से सह रहा था मैं तो ग़म-ए-जुदाईरब का करम के तेरे रोज़े पे आ गया हूँ
उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँ
मैं दिल को रख के, आक़ा ! रोज़े की जालियों परतेरी इनायतों का क़र्ज़ा चुका गया हूँ
उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँ
मुझ को राह-ए-वफ़ा में जो भी मिला है राहीदीवानगी का उस को रस्ता बता गया हूँ
उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँ
हुस्न-ए-नज़र से जिस ने रोज़े को तेरे देखाआँखों में उस की बन के सुर्मा समा गया हूँ
उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँ
दरबार-ए-मुस्तफ़ा की मिट्टी मिली जो मुझ कोमैं तो, वली ! उसी को तोशा बना गया हूँ
उल्फ़त में तेरी, आक़ा ! मजनूँ कहा गया हूँ
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