नात लिरिक्स

Sukoon Gayab Hai Aankhon Se Musalsal Ashk Jari Hai

सुकूँ ग़ायब है आँखों से मुसलसल अश्क जारी है

शायर: मुफ़्ती हफ़ीज़ुल्लाह हफ़ीज़उपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

सुकूँ ग़ायब है आँखों से, मुसलसल अश्क जारी हैतेरे जाने से, ऐ माह-ए-मुबारक ! बे-क़रारी है

बड़ी रौनक़ थी, ऐ माह-ए-मुकर्रम ! तेरे आने सेजुदाई पर तेरी थम सी गई बाद-ए-बहारी है

नहीं कुछ क़द्र-दानी कर सके हम माह-ए-रमज़ाँ की'इबादत में न दिन गुज़रे न डर कर शब गुज़ारी है

गुनहगारी की ला'नत से हमें अब दूर ही रखनातू 'आदत डाल दे, मौला ! दिलों में नेको-कारी की

इलाही ! रहमतों से तू हमें मायूस मत करनाबचा ले लाज, या रब ! तू हमारी शर्मसारी की

नहीं हम से अदा हक़ हो सका कुछ माह-ए-रमज़ाँ काम'आसी में रहे लत-पत, गुनाहों की सवारी की

तमन्नाएँ मचल कर रह गईं सीनों में, ऐ रमज़ाँ !कहाँ तुझ को बसा कर दिल में हम ने तुझ से यारी की

ऐ माह-ए-मग़्फ़िरत ! क्यूँ-कर हमें तू छोड़ जाता हैहमें रहमत की चादर में तुझे फिर से छुपाना है

तेरी आमद पे हम ने भी ख़ुशी के गीत गाए थेख़ुशामद हम ने भी की थी 'अता-ए-रब्ब-ए-बारी की

न कोई फ़िक्र है, थी ज़िंदगी शादाब करने कीन कुछ अश्क-ए-नदामत से चमन की आब-यारी की

हफ़ीज़ ! आओ कहें अब अलविदा' हम माह-ए-रमज़ाँ कोमोहब्बत में इजाज़त है कहाँ कुछ आह-ओ-ज़ारी की

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