सब उन का उतारा है, सब उन का उतारा हैसरकार के टुकड़ों पर मँगतों का गुज़ारा है
क़ुर्बान मैं उन की बख़्शिश के मक़्सद भी ज़बाँ पर आया नहींबिन माँगे दिया और इतना दिया, दामन में हमारे समाया नहीं
ईमान मिला उन के सदक़े, क़ुरआ'न मिला उन के सदक़ेरहमान मिला उन के सदक़े, वो क्या है जो हमने पाया नहीं
ख़ुर्शीद-ए-क़यामत की ताबिश माना के क़यामत ही होगीहम उन के हैं घबराएँ क्यूँ ! क्या हम पे नबी का साया नहीं !
उन मोहसिन-ए-आज़म के यूँ तो ख़ालिद पे हज़ारों एहसाँ हैंक़ुर्बान मगर उस एहसाँ के एहसाँ भी किया तो जताया नहीं
सरकार के टुकड़ों पर मँगतों का गुज़ारा है
ये नाज़, ये अंदाज़, हमारे नहीं होतेझोली में अगर टुकड़े तुम्हारे नहीं होते
मिलती न अगर भीक हुज़ूर ! आप के दर सेइस ठाट से मँगतों के गुज़ारे नहीं होते
सरकार के टुकड़ों पर मँगतों का गुज़ारा है
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