नात लिरिक्स

Sare La Makan Se Talab Hui | Balaghal Ula Bi Kamalihi

सर-ए-ला-मकाँ से तलब हुई | बलग़ल उला बि-कमालिहि

नात ख़्वान: ग़ुलाम फ़रीद साबरीशायर: अंबर वारसीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

सर-ए-ला-मकाँ से तलब हुईसू-ए-मुंतहा वो चले नबीकोई हद है उन के 'उरूज कीबलग़ल-'उला बि-कमालिहि

बलग़ल-'उला बि-कमालिहिकशफ़-द्दुजा बि-जमालिहिहसुनत जमी'उ ख़िसालिहिसल्लू 'अलैहि व आलिहि

वही ला-मकाँ के मकीं हुएसर-ए-'अर्श तख़्त-नशीं हुएवो नबी हैं जिस के हैं ये मकाँवो ख़ुदा है जिस का मकाँ नहीं

सर-ए-'अर्श पर है तेरी गुज़रदिल-ए-फ़र्श पर है तेरी नज़रमलकूत-मुल्क में कोई शयनहीं वो जो तुझ पे अयाँ नहीं

वो ख़ुदा के नूर को देख करभी जहान वालों में आ गएसर-ए-'अर्श जाना कमाल थाकि वहाँ से आना कमाल है

रुख़-ए-मुस्तफ़ा की ये रौशनीये तजल्लियों की हमाहमीकि हर एक चीज़ चमक उठीकशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि

वो सरापा रहमत-ए-किब्रियाकि हर इक पे उन का करम हुआये कलाम-ए-पाक है बरमलाहसुनत जमी'उ ख़िसालिहि

ये कमाल-ए-ख़ुल्क़-ए-मुहम्मदीकि हर इक पे चश्म-ए-करम रहीसर-ए-हश्र ना'रा-ए-उम्मतीहसुनत जमी'उ ख़िसालिहि

वही हक़-निगर, वही हक़-नुमारुख़-ए-मुस्तफ़ा है वो आईनाकि ख़ुदा-ए-पाक ने ख़ुद कहासल्लू 'अलैहि व आलिहि

मेरा दीन, 'अंबर-ए-वारसी !ब-ख़ुदा है 'इश्क़-ए-मुहम्मदीमेरा ज़िक्र-ओ-फ़िक्र है बस यहीसल्लू 'अलैहि व आलिहि

ऐ मज़हर-ए-नूर-ए-ख़ुदा !बलग़ल-'उला बि-कमालिहि

मौला 'अली मुश्किल-कुशाकशफ़-द्दुजा बि-जमालिहि

हसनैन जान-ए-फ़ातिमाहसुनत जमी'उ ख़िसालिहि

या'नी मुहम्मद मुस्तफ़ासल्लू 'अलैहि व आलिहि

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