नात लिरिक्स

Samne Ho Agar Roo-e-Khairul Bashar Phir Ibadat Ka Kitna Maza Aayega

सामने हो अगर रू-ए-ख़ैर-उल-बशर फिर इबादत का कितना मज़ा आएगा

नात ख़्वान: अहमद अली हाकिमशायर: अहमद अली हाकिमउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

सामने हो अगर रू-ए-ख़ैर-उल-बशर, फिर 'इबादत का कितना मज़ा आएगादिल में है आरज़ू, वो जो हों रू-ब-रू, फिर तिलावत का कितना मज़ा आएगा

चाँद उन को जो देखे तो हो शर्मगीं, तक के यूसुफ़ कहे आफ़रीं आफ़रींगेसू-ए-'अम्बरीं सरक जाए कहीं, फिर ज़ियारत का कितना मज़ा आएगा

सर पे सिद्दीक़ आँखों में 'उस्मान हो, धड़कनों में 'उमर जान-ए-जाँ हो 'अलीये सभी मो'तबर हम-सफ़र हों अगर, फिर रफ़ाक़त का कितना मज़ा आएगा

मुझ को ऐसे ही बीमार रहने दो तुम, न दवा चाहिए न शिफ़ा चाहिएमेरी लेने ख़बर आएँ आक़ा अगर, फिर 'इयादत का कितना मज़ा आएगा

बाब-ए-जन्नत पे रिज़वान रोके हमें, ठहर जाएँगे लेकिन सुनो, दोस्तो !जब मुहम्मद कहेंगे कि मेरे हैं ये, फिर इजाज़त का कितना मज़ा आएगा

बोले इब्न-ए-'अली कर्बला में सुनो घर लुटाना भी है, सर कटाना भी हैजब हो सज्दा अदा सामने हो ख़ुदा, फिर शहादत का कितना मज़ा आएगा

महफ़िल-ए-ना'त महशर में जब हो सजी, मीर-ए-मज्लिस हों जिस वक़्त, हाकिम ! नबीइज़्न हो ना'त पढ़ ऐ मेरे उम्मती ! फिर समा'अत का कितना मज़ा आएगा

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