नात लिरिक्स

Qareeb-e-Dayar-e-Habib-e-Khuda Mein Mera Ghar Banane Ko Ji Chahta Hai

क़रीब-ए-दयार-ए-हबीब-ए-ख़ुदा में मेरा घर बनाने को जी चाहता है

नात ख़्वान: सय्यिद हस्सानुल्लाह हुसैनीशायर: शौक़ फ़रीदीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

क़रीब-ए-दयार-ए-हबीब-ए-ख़ुदा मेंमेरा घर बनाने को जी चाहता हैबची ज़िंदगी अपनी सारी की सारीवहीं पर बिताने को जी चाहता है

चले थे 'उमर क़त्ल करने नबी कोरुख़-ए-मुस्तफ़ा पर नज़र जब पड़ी तोकहा, मुझ को कलमा पढ़ा दीजे, आक़ा !कि अब क़ुर्ब पाने को जी चाहता है

बसा जब से नज़रों में है आप का दरनहीं भाता आँखों को अब कोई मंज़र'अता कीजिए फिर से इज़्न-ए-मदीनाकि फिर दर पे आने को जी चाहता है

गवर्नर हैं तयबा मुबारक शहर केवो प्यारे चचा हैं ख़ैर-उल-बशर केमिले जिन के सदक़े से इज़्न-ए-मदीनाउसी दर पे जाने को जी चाहता है

मदीने की गलियों के दिलकश नज़ारेजहाँ खेलते थे वो सिब्तैन प्यारेख़ुदाया ! उन्ही पाक राहों में अपनीये आँखें बिछाने को जी चाहता है

वो जब्ल-ए-उहुद जो है प्यारा नबी काहै ग़ार-ए-हिरा में उजाला नबी कातजल्ली से उस की दियों को जला करवहीं बैठ जाने को जी चाहता है

वो सिद्दीक़-ओ-फ़ारूक़-ओ-'उस्मान-ओ-हैदरजो हैं सारे असहाब-ए-आक़ा के सरवरख़ुदा फ़ज़्ल फ़रमाए तो उन की क़ुर्बतक़यामत में पाने को जी चाहता है

बक़ी'-ए-मुबारक है इक पाक गुलशनहै अज़्वाज-ओ-आल-ओ-सहाबा का मदफ़नतसर्रुफ़ नहीं मौत पर अपना वर्नावहाँ मर ही जाने को जी चाहता है

ये हसरत है दिल की, ऐ शौक़-ए-फ़रीदी !क़रीब-ए-नबी हो मेरी भी रसाईकरूँ पेश उन को मैं ना'तों का तोहफ़ाये हसरत मिटाने को जी चाहता है

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