नात लिरिक्स

Nabi Ke Rauze Ko Choom Loonga Kabhi Idhar Se Kabhi Udhar Se

नबी के रौज़े को चूम लूँगा कभी इधर से कभी उधर से

नात ख़्वान: ग़ुलाम साबिर और ग़ुलाम वारिसउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

नबी के रौज़े को चूम लूँगा, कभी इधर से, कभी उधर सेतो मुझ पे साया करम का होगा, कभी इधर से, कभी उधर से

नबी के रौज़े को चूम लूँगा, कभी इधर से, कभी उधर सेबहेगा मुझ पर करम का दरिया, कभी इधर से, कभी उधर से

करूँगा मैं जब तवाफ़-ए-का'बा, तो वो दिखाएँगे अपना जल्वानबी का दीदार मैं करूँगा, कभी इधर से, कभी उधर से

हबीब-ए-दावर शफ़ी'-ए-महशर, वो जब पिलाएँगे आब-ए-कौसरमैं उन के हाथों से जाम लूँगा, कभी इधर से, कभी उधर से

रुख़-ए-जुनूबी, रुख़-ए-शुमाली में होंगे दोनों तरफ़ सुवालीमैं उन से दिल की मुराद लूँगा, कभी इधर से, कभी उधर से

उधर हो का'बा इधर मदीना, ये होगा, 'अंबर ! मेरा क़रीनामैं भीक दोनों तरफ़ से लूँगा, कभी इधर से, कभी उधर से

बुलाएँगे जब मदीने वाले, करम की ख़ैरात फिर मैं लेनेबढ़ूँगा फिर अपने दिल को थामे, कभी इधर से, कभी उधर से

जहाँ में ना'तें मैं पढ़ रहा हूँ, करम है मुझ पर ये मुस्तफ़ा काजो सब की बिगड़ी बना रहे हैं, कभी इधर से, कभी उधर से

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